80 सालों से नहीं हुआ माँ काली का विसर्जन, नवरात्रि पर सजता है दरबार, सिर्फ तालाब के जल से धुलता है मुख
इन दिनों शारदीय नवरात्रि को धूम मची हुई है दुर्गा पंडालों में माँ की आकर्षक प्रतिमाएं विराजमान की गयी हैं जिनका दशहरे पर विधि-विधान से विसर्जन किया जाएगा। लेकिन एक दुर्गा प्रतिमा ऐसी भी हैं जिनका विसर्जन नहीं किया जाता। ये सिलसिला पिछले 80 सालों से चला आ रहा है। नौ दिन बाद माँ की प्रतिमा को सुरक्षित रख दिया जाता है। जी हां सही सुना आपने, दतिया जिले में दारुगर की पुलिया पर विराजी माँ काली की ये अनोखी प्रतिमा विराजमान हैं। जो मिट्टी से बनी हुई है। खास बात ये है की तालाब तक तो माँ को ले जाया जाता है लेकिन विसर्जन न करके सिर्फ मुख धुलाया जाता है फिर वापिस प्रतिमा पंडाल में पहुंच जाती है।
बताया जाता है की मां काली की प्रतिमा को 80 साल से विसर्जित नहीं किया गया। मिट्टी से बनी इस प्रतिमा की हर साल मरम्मत और सजावट की जाती है। नवरात्रि में नौ दिनों तक विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जाती है और नवरात्रि के समापन पर प्रतिमा को सुरक्षित वापस पंडाल में लाया जाता है।
दारूगर की पुलिया पर कई सालों से पान की दुकान चलाने वाले 79 साल के राजाराम चौरसिया बताते हैं की वह बचपन से ही यहां मां काली का दरबार सजा देख रहे हैं। कुरियाने मोहल्ले के परिवारों ने मिलकर प्रतिमा स्थापना की परंपरा शुरू की थी। जिस चबूतरे पर आज माता की प्रतिमा स्थापित है। वह पहले स्थानीय निवासी नारायणदास पाठक का था। जिन्होंने श्रद्धालुओं को नियमित रूप से पूजा करते देख चबूतरा दान कर दिया था। इसके बाद लोगों ने आर्थिक सहयोग से टीनशेड बनवाया। ताकि प्रतिमा को मौसम के प्रभाव से बचाया जा सके।
स्थानीय लोग बताते हैं की कुरियाने क्षेत्र में पर्वत कोरी नाम के एक भक्त थे। जो नियमित रूप से सुखदेव बाबा के पहाड़ पर साधना करने जाते थे। ऐसी मान्यता है की एक दिन साधना के दौरान मां काली ने उन्हें नन्हीं कन्या के रूप में दर्शन दिए। जिसके बाद उन्होंने यहां मां काली की प्रतिमा स्थापित करने का संकल्प लिया। तभी से ये परंपरा चली आ रही है। प्रतिमा मिट्टी से बनी हुई है जहां नवरात्र में बड़ी संख्या में लोग दर्शनों को पहुंचते हैं। नवरात्रि के आख़िरी दिन जवारे विसर्जन के दौरान माँ काली की प्रतिमा को गाजे-बाजे के साथ तालाब तक ले जाया जाता है लेकिन वहां विसर्जन न करके सिर्फ मुख धुलाकर प्रतिमा को ढककर वापस पंडाल तक लाया जाता है। प्रतिमा को सुरक्षित रखने समेत तमाम जिम्मेदारियां अब बुलकिया परिवार के जिम्मे हैं जो तीन पीढ़ियों से इसे निभा रहे हैं। दारूगर की पुलिया पर स्थित मां काली का यह दरबार स्थानीय आस्था और सांस्कृतिक परंपरा का अनूठा केंद्र बना हुआ है।-