महालक्ष्मी व्रत की 16 बोल की कहानी का रहस्यमयी स्थान मिला, नीलकंठ धाम में है प्राचीन शिवलिंग
क्या आपने महालक्ष्मी व्रत के दौरान सुनी जाने वाली 16 बोल की कहानी सुनी है? कहानी की शुरुआत होती है—“अमोती दमोती रानी, पोला पर ऊंचो सो परपाटन गांव, जहां के राजा मगर सेन, दमयंती रानी...” लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इस कहानी में बताए गए परपाटन गांव का वास्तविक स्थान कहां है? एमपी के रायसेन से एक ऐसी ही धार्मिक मान्यता से जुड़ी जगह सामने आई है, जिसे स्थानीय लोग महालक्ष्मी व्रत की इस कथा से जोड़कर देखते हैं। रायसेन जिले की गैरतगंज तहसील में स्थित नीलकंठ धाम में एक प्राचीन शिवलिंग है, जिसे स्थानीय श्रद्धालु 1108 रुद्रियों वाला स्वयंभू शिवलिंग मानते हैं। धार्मिक मान्यता है कि यहां एक लोटा जल चढ़ाने से 1108 लोटा जल के अभिषेक के बराबर पुण्य मिलता है और एक बेलपत्र अर्पित करने का फल भी 1108 बेलपत्र चढ़ाने के समान माना जाता है।
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार यह स्थान 500 वर्ष से भी अधिक पुराना है। कहा जाता है कि राजा मगर सेन ने अपनी रानियों की पूजा के लिए भगवान शिव से प्रार्थना की थी और इसी स्थान पर स्वयंभू शिवलिंग प्रकट हुआ। बाद में एक संत को स्वप्न में भगवान शिव के यहां होने का संकेत मिला और उन्होंने शिवलिंग को दोबारा स्थापित कराया। पाटन गांव के बुजुर्ग और स्थानीय लोग इस स्थान को महालक्ष्मी व्रत की 16 बोल की कथा में बताए गए परपाटन गांव से जोड़ते हैं। गांव की बुजुर्ग महिला जमुना देवी ने भी कथा सुनाते हुए इस स्थान की स्थानीय मान्यता बताई। पहाड़ी पर राजा मगर सेन के महल के अवशेष होने का दावा भी स्थानीय लोगों द्वारा किया जाता है।
नीलकंठ धाम में सावन के दौरान श्रद्धालु नर्मदा जल लेकर पहुंचते हैं। नागपंचमी, बसंत पंचमी और महाशिवरात्रि पर यहां भक्तों की भीड़ जुटती है। मंदिर परिसर में सिद्ध धूनी भी है, जिसके बारे में श्रद्धालुओं की अपनी धार्मिक मान्यताएं हैं। महंत महाकाल बाबा और यहां आने वाले भक्त इस स्थान को बेहद प्राचीन और आस्था का केंद्र बताते हैं। हालांकि 16 बोल की कथा में वर्णित स्थान के साथ नीलकंठ धाम की पहचान स्थानीय धार्मिक मान्यता है, इसका ऐतिहासिक प्रमाण अलग विषय है। यही वजह है कि महालक्ष्मी व्रत की कहानी और इस स्थान का संबंध आज भी श्रद्धा, लोककथा और स्थानीय इतिहास के बीच एक दिलचस्प कड़ी बना हुआ है।