आधी रोटी और पांच पीढ़ियों के आशीर्वाद की कहानी, सिंधिया ने निभाई 300 साल पुरानी परंपरा, मंसूर शाह की पूजा
ऐतिहासिक महाराज बाड़े में एक बार फिर सिंधिया राजपरिवार से जुड़ी करीब 300 साल पुरानी परंपरा देखने को मिली। एमपी के ग्वालियर के केंद्रीय मंत्री और सिंधिया राजपरिवार के मुखिया ज्योतिरादित्य सिंधिया मंगलवार को गोरखी परिसर स्थित देवघर पहुंचे। यहां उन्होंने सूफी संत बाबा मंसूर शाह से जुड़ी स्मृतियों के सामने पूजा-अर्चना की और आशीर्वाद लिया। रिपोर्टों के मुताबिक, यह परंपरा महादजी सिंधिया के समय से चली आ रही है और राजपरिवार का मुखिया इसे निभाता रहा है। गोरखी के देवघर में बाबा मंसूर शाह से जुड़ी कई वस्तुएं सुरक्षित रखी गई हैं। इनमें उनके वस्त्र, ताबीज और अन्य स्मृतियों के साथ एक आधी रोटी का टुकड़ा भी शामिल बताया जाता है। इसी आधी रोटी से जुड़ी एक प्रचलित मान्यता सिंधिया राजपरिवार और सूफी संत के बीच संबंध की सबसे चर्चित कहानी है।
कहानी के मुताबिक, पानीपत के युद्ध के दौरान महादजी सिंधिया गंभीर रूप से घायल हो गए थे। उस समय परिवार को उनकी सलामती की चिंता थी। प्रचलित कथा के अनुसार, महादजी की मां और पत्नी सूफी संत मंसूर शाह के पास पहुंचीं। संत ने उन्हें महादजी के जीवित होने और वापस लौटने का भरोसा दिलाया। इसके बाद कुछ समय में महादजी सिंधिया के जीवित लौटने की बात सामने आई। परिवार ने इस घटना को मंसूर शाह के आशीर्वाद से जोड़कर देखा। इसी प्रसंग के बाद दोनों के बीच आस्था और श्रद्धा का संबंध और मजबूत होने की मान्यता है। प्रचलित कथा का सबसे खास हिस्सा आधी रोटी से जुड़ा है। मान्यता के अनुसार, मंसूर शाह ने महादजी सिंधिया को अपनी आधी रोटी दी और पांच पीढ़ियों तक राज करने का आशीर्वाद दिया। इसी आधी रोटी के एक हिस्से को आज भी सिंधिया परिवार की धरोहर के तौर पर सुरक्षित रखे जाने की जानकारी सामने आती है।
देवघर की खासियत यह भी बताई जाती है कि यहां सिंधिया परिवार के कुलदेवताओं और अन्य हिंदू देवी-देवताओं से जुड़ी स्मृतियों के साथ बाबा मंसूर शाह से संबंधित वस्तुएं भी संरक्षित हैं। राजपरिवार की परंपरा में इस पूजा का विशेष महत्व बताया जाता है। ज्योतिरादित्य सिंधिया के देवघर पहुंचने के साथ ही एक बार फिर इतिहास, परंपरा और आस्था से जुड़ी यह कहानी चर्चा में आ गई। सिंधिया परिवार और मंसूर शाह के संबंध से जुड़ी ये बातें मुख्य रूप से पारिवारिक परंपराओं और प्रचलित मान्यताओं पर आधारित हैं। इस आयोजन के जरिए ग्वालियर की राजपरंपरा और सांस्कृतिक विरासत से जुड़ा एक ऐसा प्रसंग भी सामने आया, जिसमें सूफी संत के प्रति सिंधिया परिवार की पीढ़ियों पुरानी श्रद्धा की झलक मिलती है।