Sagar-खेतों के बीच क्रेशर की तैयारी, आदिवासी किसानों को सता रहा रोजी-रोटी छिनने का डर
सागर जिले के पड़रिया गांव में प्रस्तावित क्रेशर प्लांट ने खेतों में मेहनत कर अपने परिवार का पेट पालने वाले दर्जनों छोटे किसानों की चिंता बढ़ा दी है। किसानों का कहना है कि उनके लिए खेत सिर्फ जमीन का टुकड़ा नहीं, बल्कि रोजगार, रोटी और बच्चों के भविष्य का सहारा है। अब इन्हीं खेतों के बीच क्रेशर लगाए जाने की तैयारी की खबर ने उन्हें भविष्य की चिंता में डाल दिया है।
पड़रिया के किसानों का कहना है कि यदि कृषि योग्य भूमि के बीच क्रेशर प्लांट शुरू होता है तो पत्थरों से निकलने वाली धूल और डस्ट हवा के साथ आसपास के खेतों में पहुंचेगी। इससे फसलों और मिट्टी की गुणवत्ता प्रभावित होगी, किसानों को डर है कि लगातार धूल जमा होने से उनके खेत फसल से उपज देना बंद कर देंगे,ऐसे में उनके सामने परिवार का भरण-पोषण करना मुश्किल हो जाएगा।
किसानों का कहना है कि कोई किसान एक एकड़ तो कोई दो एकड़ जमीन पर खेती करता है। इन्हीं छोटी-छोटी जोतों से परिवार का राशन, बच्चों की पढ़ाई और रोजमर्रा का खर्च चलता है। ऐसे में अगर खेती प्रभावित हुई तो उनके पास आय का दूसरा कोई बड़ा साधन नहीं है। और बुंदेलखंड के दूसरे लोगो की तरह उन्हें अपना घर परिवार छोड़कर दूसरे राज्यों में मजदूरी के लिए भटकना पड़ेगा, ऐसे में गरीब छोटे और आदिवासी किसानो ने प्रशासन से यहां पर प्लांट को नहीं खोले जाने की मांग की है, साथ ही कहा कि जो प्रक्रिया अभी चल रही है उसको निरस्त किया जाए,
मंगलवार को इसी चिंता और न्याय की उम्मीद लेकर पड़रिया के दर्जनों किसान कलेक्ट्रेट की जनसुनवाई में पहुंचे। किसानों ने अधिकारियों को शिकायत देकर बताया कि परसोरिया के हार्डवेयर व्यापारी बबलू जैन की पड़रिया मौजा में करीब पांच एकड़ से अधिक जमीन है। उनके खेत की मेढ़ से लगे करीब 50 किसानों के छोटे-छोटे खेत हैं। किसानों का आरोप है कि इसी जमीन पर क्रेशर प्लांट लगाए जाने की तैयारी की जा रही है।
किसानों ने यह भी बताया कि प्रस्तावित क्रेशर से करीब एक किलोमीटर के दायरे में परसोरिया और लगभग डेढ़ किलोमीटर के क्षेत्र में पड़रिया गांव बसा हुआ है। उनका कहना है कि क्रेशर से निकलने वाली धूल आसपास के आबादी वाले क्षेत्रों तक पहुंचेगी, जिससे लोगों को सांस संबंधी परेशानी, अस्थमा और त्वचा संबंधी एलर्जी जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है।
जनसुनवाई में पहुंचे किसानों ने प्रशासन से मांग की कि कृषि योग्य भूमि और आबादी के बीच क्रेशर प्लांट लगाने की अनुमति न दी जाए और पूरे मामले की जांच कर किसानों के हित में निर्णय लिया जाए।
शिकायत करने वाले किसानों में रतन आदिवासी, गोपाल आदिवासी, खुमान आदिवासी, मर्दन प्रजापति, पप्पू प्रजापति, बबलू आदिवासी, रामकुमार मिश्रा, कुसुम मिश्रा, मेघा मिश्रा, रामरतन पाठक, तुलसीराम आदिवासी, सीताराम आदिवासी, रामचरण, सुदामा आदिवासी, हल्ले आदिवासी, विष्णु आदिवासी, गुड्डे आदिवासी, मुंशी आदिवासी सहित अन्य किसान शामिल रहे।
किसानों की मांग साफ है—विकास हो, लेकिन उनकी खेती और जिंदगी की कीमत पर नहीं। उनका कहना है कि क्रेशर से किसी को रोजगार या कारोबार मिल सकता है, लेकिन अगर धूल के कारण उनकी जमीन और फसल प्रभावित हुई तो उनकी पूरी पीढ़ी की रोजी-रोटी संकट में पड़ जाएगी। किसानों का कहना है, “हमारे लिए खेत ही सब कुछ हैं। खेत बचेंगे, तभी हमारा परिवार बचेगा