बेटी बनी पिता का सहारा ! अर्थी को दिया कंधा, मुखाग्नि देकर पेश की अनोखी मिसाल
एक ऐसी भावुक तस्वीर सामने आई है, जिसने हर किसी की आंखें नम कर दीं। यह सिर्फ एक अंतिम यात्रा नहीं थी, बल्कि समाज की पुरानी सोच को चुनौती देने वाली एक प्रेरणादायक कहानी भी थी। यहां एक बेटी ने अपने पिता की अर्थी को कंधा देकर और मुखाग्नि देकर यह साबित कर दिया कि बेटियां किसी भी जिम्मेदारी में बेटों से कम नहीं हैं। एमपी के दतिया के पंचशील नगर निवासी जितेंद्र दुबे का लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया। पिता के जाने का दुख बेटी रेशू दुबे के लिए बेहद गहरा था, लेकिन इस कठिन समय में उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। जब अंतिम यात्रा निकली तो रेशू दुबे ने अपने पिता की अर्थी को कंधा दिया और पूरे रास्ते नम आंखों के साथ अंतिम यात्रा में शामिल रहीं।
अक्सर समाज में अंतिम संस्कार और मुखाग्नि देने का अधिकार केवल बेटों से जोड़ा जाता रहा है, लेकिन रेशू दुबे ने इस परंपरागत सोच को पीछे छोड़ते हुए अपने पिता के अंतिम संस्कार की सभी जिम्मेदारियां खुद निभाईं। सखी बाबा मुक्तिधाम पहुंचने के बाद वैदिक मंत्रोच्चार और धार्मिक विधि-विधान के बीच रेशू ने अपने पिता को मुखाग्नि देकर अंतिम विदाई दी। यह दृश्य वहां मौजूद लोगों को भावुक कर गया। कई लोगों की आंखों से आंसू छलक पड़े और सभी ने बेटी के इस साहसिक कदम की सराहना की।
स्थानीय लोगों का कहना है कि बदलते दौर में बेटियां हर क्षेत्र में अपनी क्षमता साबित कर रही हैं। शिक्षा, प्रशासन, सेना और कारोबार के बाद अब सामाजिक और पारिवारिक परंपराओं में भी बेटियां नई मिसाल कायम कर रही हैं। रेशू दुबे का यह कदम केवल एक परिवार की कहानी नहीं, बल्कि समाज के लिए एक मजबूत संदेश है। यह घटना बताती है कि रिश्तों की जिम्मेदारियां लिंग नहीं, बल्कि भावनाएं और संस्कार तय करते हैं। दतिया से सामने आई यह तस्वीर आज हजारों लोगों के लिए प्रेरणा बन गई है और यह संदेश दे रही है कि बेटियां हर परिस्थिति में परिवार की सबसे मजबूत ताकत बन सकती हैं।