सागर- मृत्यु के बाद भी रोशन की दो जिंदगियां, सुगंधी बाई का नेत्रदान-देहदान बना मिसाल
सागर से मानवता को प्रेरित करने वाली एक भावुक और गौरवपूर्ण खबर सामने आई है। मोतीनगर क्षेत्र की 72 वर्षीय सुगंधी बाई जैन ने मृत्यु के बाद भी जीवन का उजाला बांटते हुए नेत्रदान और देहदान कर समाज के सामने एक अनोखी मिसाल पेश की है। दरअसल, भाग्योदय अस्पताल में उपचार के दौरान सुगंधी बाई ने अंतिम सांस ली। लेकिन उनकी अंतिम इच्छा सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं थी। उन्होंने अपने जीवनकाल में ही नेत्रदान और देहदान का संकल्प लिया था, जिसे उनके परिवार ने शोक की इस घड़ी में भी पूरी निष्ठा के साथ निभाया।
परिजनों—पुत्र नितिन जैन, निशांत जैन, पुत्री नेहा जैन, दामाद सुरेंद्र जैन और देवर चक्रेश सिंघई—ने तुरंत आई बैंक से संपर्क किया। बुंदेलखंड चिकित्सा महाविद्यालय की टीम ने तत्परता दिखाते हुए सफलतापूर्वक उनका कॉर्निया सुरक्षित किया। इस नेत्रदान से दो अंधेरी जिंदगियों में रोशनी आने की उम्मीद जगी है। इसके बाद परिवार ने सुगंधी बाई के पार्थिव शरीर को बीएमसी के एनाटॉमी विभाग को सौंप दिया। यह देहदान मेडिकल छात्रों के प्रशिक्षण और भविष्य में कई जिंदगियों को बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
इस महान कार्य के सम्मान में शासन के विशेष प्रोटोकॉल के तहत उन्हें ‘गार्ड ऑफ ऑनर’ भी दिया गया। यह बुंदेलखंड मेडिकल कॉलेज, सागर में इस श्रेणी का छठा देहदान है, जो अपने आप में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। बीएमसी के अधिष्ठाता डॉ. पी.एस. ठाकुर ने जैन परिवार के इस फैसले को सराहनीय बताते हुए कहा कि देहदान सबसे बड़ा दान है, जो आने वाली पीढ़ियों के डॉक्टरों को जीवन बचाने की सीख देता है। इस पूरी प्रक्रिया में आई बैंक इंचार्ज डॉ. सारिका चौहान, डॉ. रोशी जैन और उनकी टीम की अहम भूमिका रही। सुगंधी बाई का यह ‘महादान’ सिर्फ एक परिवार का फैसला नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए एक प्रेरणा है—कि जीवन के बाद भी इंसान किसी के काम आ सकता है।