गड्ढों का पानी पीने को मजबूर आदिवासी गांव, मवेशियों के साथ एक ही घाट, हर घर जल योजना फेल !
एमपी के बड़वानी जिले से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जो सरकारी दावों की हकीकत बयां करती है। यहां “हर घर जल मिशन” सिर्फ कागजों तक सीमित नजर आ रहा है, जबकि जमीनी हकीकत बेहद चिंताजनक है। पानसेमल जनपद की ग्राम पंचायत बायगोर के अंबा पड़ावा गांव में लोग आज भी पीने के पानी के लिए तरस रहे हैं। हालात इतने खराब हैं कि ग्रामीणों को नाले में खुदे गड्ढों, यानी ‘झिरी’ से रिसने वाला दूषित पानी पीने को मजबूर होना पड़ रहा है। यही पानी मवेशी भी पी रहे हैं—यानी इंसान और जानवर एक ही स्रोत पर निर्भर हैं।
गर्मी की शुरुआत होते ही जल संकट ने विकराल रूप ले लिया है। गांव में न तो हैंडपंप काम कर रहे हैं और न ही नल-जल योजना के तहत कोई कनेक्शन मिला है। महिलाएं रोजाना 2 किलोमीटर दूर से पानी लाने के लिए तपती धूप में निकलती हैं, जिससे उनकी दिनचर्या पूरी तरह प्रभावित हो रही है। ग्रामीण शिवराम बताते हैं कि पानी के लिए घंटों इंतजार करना पड़ता है। सूखे नालों के किनारे गड्ढे खोदकर पानी रिसने का इंतजार किया जाता है, फिर उसी गंदे पानी को छानकर पीने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। इस वजह से गांव में उल्टी-दस्त जैसी बीमारियों का खतरा भी लगातार बना हुआ है।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि उन्होंने कई बार प्रशासन और जनप्रतिनिधियों को शिकायत दी, लेकिन अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। “हर घर जल” योजना के बड़े-बड़े दावे यहां पूरी तरह खोखले साबित हो रहे हैं। वहीं, इस मामले में पानसेमल एसडीएम रमेशचंद्र सिसौदिया ने कहा है कि मामला संज्ञान में आया है और जल्द ही पीएचई विभाग के साथ मिलकर गांव में हैंडपंप और ट्यूबवेल की व्यवस्था कराई जाएगी। फिलहाल सवाल यही है—क्या इन ग्रामीणों को स्वच्छ पानी नसीब होगा, या फिर झिरी का गंदा पानी ही उनकी किस्मत बना रहेगा?