आस्था और रोमांच का संगम, एशिया का सबसे बड़ा मेघनाथ मेला, 60 फीट ऊंचे स्तंभ से हवा में झू ले भक्त
मध्य प्रदेश के सिवनी जिले में आस्था, परंपरा और रोमांच का अद्भुत संगम देखने को मिला, जहां होली के अगले दिन आयोजित एशिया के सबसे बड़े ‘मेघनाथ मेले’ में हजारों श्रद्धालु उमड़ पड़े। केवलारी विकासखंड के ग्राम पांजरा में लगने वाला यह मेला आदिवासी संस्कृति और सदियों पुरानी मान्यताओं का जीवंत उदाहरण माना जाता है। होलिका दहन के बाद धुरेड़ी के दिन आयोजित होने वाला यह मेला क्षेत्र में विशेष महत्व रखता है। यहां आदिवासी समुदाय रावण के पुत्र मेघनाथ को अपना आराध्य मानते हुए उनकी विशेष पूजा-अर्चना करता है। मेले की शुरुआत पारंपरिक विधि-विधान से मेघनाथ स्तंभ की पूजा के साथ हुई। इस दौरान पूरा मेला परिसर आदिवासी समाज के पारंपरिक जयघोष “हाकड़े बिर्रे” से गूंज उठा।
मेले का सबसे बड़ा आकर्षण करीब 60 फीट ऊंचा लकड़ी का मेघनाथ स्तंभ रहा। मान्यता है कि इस स्तंभ पर उल्टा लटककर झूला झूलने से मनोकामनाएं पूरी होती हैं। इसी आस्था के चलते मन्नत पूरी होने पर श्रद्धालु खंभे के मचान पर चढ़ते हैं, रस्सियों से बंधकर हवा में लटकते हुए गोल-गोल चक्कर लगाते हैं। यह नजारा जितना रोमांचक होता है, उतना ही आस्था से भरा भी। ऊंचाई पर झूलते भक्तों को देखकर मेले में मौजूद हजारों लोग उत्साह और श्रद्धा से जयकारे लगाते हैं।
इस मेले में केवलारी क्षेत्र ही नहीं बल्कि आसपास के करीब 20 से 25 गांवों से हजारों आदिवासी और अन्य समाज के लोग शामिल होते हैं। ग्रामीणों का मानना है कि मेघनाथ देव की कृपा से उनकी हर मन्नत पूरी होती है, इसलिए हर साल वे यहां आकर इस परंपरा का हिस्सा बनते हैं। मेले में पारंपरिक नृत्य, लोकगीत और सामाजिक मेलजोल का भी खास माहौल देखने को मिला। आदिवासी संस्कृति की झलक दिखाते इस आयोजन ने पूरे क्षेत्र को उत्सव के रंग में रंग दिया। आस्था, परंपरा और रोमांच से भरा यह मेघनाथ मेला न सिर्फ धार्मिक विश्वास का प्रतीक है, बल्कि आदिवासी समाज की सांस्कृतिक विरासत को भी जीवंत बनाए रखने का एक अनूठा उदाहरण है।