अस्पताल का गेट बंद, इंसानियत शर्मसार, नाले के पास गर्भवती ने दिया बच्चे को जन्म
एमपी के सागर संभाग के दमोह जिले के हटा ब्लॉक से सामने आई यह घटना न केवल स्वास्थ्य व्यवस्था की पोल खोलती है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं को भी झकझोर कर रख देती है। रनेह आरोग्यम केंद्र में सोमवार रात एक गर्भवती महिला के साथ जो हुआ, उसने सरकारी अस्पतालों की हकीकत पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
ग्राम रनेह निवासी 27 वर्षीय रामप्यारी रैकवार, पति खेमचंद्र रैकवार, को सोमवार देर रात अचानक प्रसव पीड़ा शुरू हुई। परिजन तुरंत उसे नजदीकी रनेह आरोग्यम केंद्र लेकर पहुंचे। लेकिन आरोप है कि अस्पताल का मुख्य गेट बंद था और वहां तैनात गार्ड ने दरवाजा खोलने से साफ इनकार कर दिया। परिजनों ने गेट खोलने की मिन्नतें कीं, हाथ जोड़कर गुहार लगाई, लेकिन गार्ड का जवाब था—“अभी नर्स ड्यूटी पर नहीं है, सुबह आना।”
समय पर इलाज न मिलने के कारण मजबूर परिजन गर्भवती महिला को वापस घर ले जाने लगे। लेकिन नियति को कुछ और मंजूर था। अस्पताल से कुछ ही दूरी पर, नाले के पास रामप्यारी ने एक शिशु को जन्म दे दिया। ठंड, अंधेरा और असहाय हालात—इन सबके बीच हुई यह डिलीवरी किसी भयावह सपने से कम नहीं थी। बच्चे के जन्म के बाद परिजनों ने तत्काल महिला और नवजात को सिविल अस्पताल हटा पहुंचाया, जहां दोनों का इलाज जारी है। फिलहाल जच्चा-बच्चा सुरक्षित बताए जा रहे हैं, लेकिन परिजनों का गुस्सा और दर्द साफ झलक रहा है।
परिजनों ने अस्पताल में पदस्थ कर्मचारी राहुल असाटी पर गेट न खोलने का आरोप लगाया है। इस दौरान परिजनों और कर्मचारी के बीच बातचीत का एक वीडियो भी सामने आया है, जो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। वीडियो में कर्मचारी यह कहते हुए नजर आ रहा है कि “नर्स अस्पताल में नहीं है” और 108 एंबुलेंस बुलाने की सलाह दे रहा है। मामले की गंभीरता को देखते हुए कलेक्टर सुधीर कोचर ने तत्काल संज्ञान लेते हुए जांच के आदेश दिए हैं। हटा बीएमओ डॉ. उमाशंकर पटेल को पूरे प्रकरण की जांच सौंपी गई है। अब बड़ा सवाल यह है कि अगर आपात स्थिति में भी अस्पताल का गेट नहीं खुलेगा, तो फिर गरीब और ग्रामीण मरीजों के लिए ऐसी स्वास्थ्य व्यवस्थाओं का क्या मतलब रह जाता है? यह घटना सिस्टम की एक और दर्दनाक सच्चाई को उजागर करती है।