Sagar- गौर जयंती पर जस्टिस शर्मा का बड़ा संदेश, सजा इंसान को सुधारने की हो, डराने की नहीं
डॉ. हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय के संस्थापक डॉ. सर हरीसिंह गौर की 156वीं जयंती सागर शहर में बुधवार को पूरे सम्मान और भव्यता के साथ मनाई गई। मुख्य समारोह में देश की सर्वोच्च अदालत सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति सतीश चन्द्र शर्मा मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए। मंच से उन्होंने डॉ. गौर के विचारों, उनके सुधारवादी दृष्टिकोण और अपने छात्र जीवन की यादों को बेहद भावुक अंदाज में साझा किया।
जस्टिस शर्मा ने कहा कि डॉ. गौर कठोर सजाओं और कैदियों को कालकोठरी में अकेला बंद रखने के खिलाफ थे। उनका कहना था कि सजा ऐसी होनी चाहिए जो इंसान को सुधार दे, न कि उसे सिर्फ शारीरिक और मानसिक पीड़ा पहुंचाए। वे आज भी फैसले लिखते समय डॉ. गौर की कानून सम्बन्धी किताबों का अध्ययन करते हैं।
भावनात्मक लहजे में उन्होंने सागर से अपने गहरे नाते का उल्लेख किया। बोले—“मेरे पिता सागर यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर थे। मैं 12वीं के बाद सागर आया, बीएससी की पढ़ाई यहीं की। इसके बाद लॉ की पढ़ाई के लिए जबलपुर गया। सागर मेरे लिए घर जैसा है।” उन्होंने सामाजिक सुधारों की बात करते हुए कहा— “पहले बच्चियों की शादी 12 साल में कर दी जाती थी।
गौर साहब के प्रयासों से शादी की उम्र बढ़ाई गई और आज बच्चियों को मानसिक आघात से बचाया जा रहा है। उनकी सोच हमें शिक्षा और प्रगति की दिशा दिखाती है।” मंच पर मौजूद कैबिनेट मंत्री गोविंद सिंह राजपूत को देखते हुए उन्होंने छात्र जीवन का मज़ेदार किस्सा सुनाया। हँसते हुए बोले— “हम साथ पढ़ते थे। तब भी गोविंद सिंह की फटकी चलती थी… आज भी चल रही है!” मंच पर यह बात सुनकर पूरा सभागार ठहाकों से गूंज उठा।
सुबह तीनबत्ती तिराहे से भव्य गौर शोभायात्रा निकाली गई, जो बैंड-बाजे के साथ कई प्रमुख मार्गों से होती हुई विश्वविद्यालय पहुंची। यहां गौर समाधि पर पुष्पांजलि अर्पित की गई। समारोह में सिंगल गर्ल चाइल्ड और दिव्यांग श्रेणी के स्नातक प्रथम वर्ष के मेधावी विद्यार्थियों को 25-25 हजार की आर्थिक सहायता दी गई। साथ ही दुनिया के टॉप 2% वैज्ञानिकों की सूची में शामिल विश्वविद्यालय के शिक्षकों का भी सम्मान किया गया। कार्यक्रम में सांसद , कुलाधिपति कन्हैयालाल बेरवाल सहित बड़ी संख्या में लोग उपस्थित रहे।