सागर के काली मंदिर बाबा द्वार में हजारों जवारे अर्पित, कटीला परंपरा बनी आस्था का केंद्र
सागर शहर में नवरात्रि के समापन पर एक ऐसा धार्मिक आयोजन देखने को मिला, जिसने आस्था, परंपरा और लोक संस्कृति का अद्भुत मेल सामने रखा। तिली वार्ड स्थित काली मंदिर बाबा द्वार दरबार में इस वर्ष भी प्राचीन परंपरा के तहत जवारे विसर्जन और कटीला चलने का अनूठा आयोजन श्रद्धा और उल्लास के साथ संपन्न हुआ। सार्वजनिक काली कमेटी, तिली वार्ड के तत्वावधान में आयोजित इस धार्मिक कार्यक्रम में शहर और आसपास के क्षेत्रों से हजारों भक्त शामिल हुए। सागर में सबसे अधिक जवारे बाबा द्वार काली मंदिर में ही अर्पित किए जाते हैं, और इस बार यह संख्या एक हजार के पार पहुंची।
जवारे पहले पंडा के घर पर रखे जाते हैं, जहां उपवासधारी भक्त दिन-रात उनकी सेवा करते हैं और माता की उपासना में लीन रहते हैं। ढोल-नगाड़ों, भजनों और जयकारों के बीच जवारे लेकर श्रद्धालु मंदिर परिसर में पहुंचे और फिर पारंपरिक स्वरूप में उनका विसर्जन किया गया। इस आयोजन की सबसे खास परंपरा रही—कटीला चलना। भक्तजन अपने व्यक्तिगत दुख, संकट और कष्टों को माता के चरणों में समर्पित करते हुए कटीला निकालते हैं। यह आस्था सागर शहर की धार्मिक पहचान में गहराई से जुड़ी हुई है और वर्षों से निरंतर जारी है।
सार्वजनिक काली कमेटी, तिली वार्ड के अध्यक्ष अंकुश चौरसिया ने बताया कि बाबा द्वार की यह परंपरा सिर्फ धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि शहर की सांस्कृतिक धरोहर है। उन्होंने कहा कि आने वाली पीढ़ियों तक इस विरासत को सुरक्षित रखना सभी की जिम्मेदारी है। कमेटी के सदस्यों और स्थानीय श्रद्धालुओं ने मिलकर कार्यक्रम को सफल और अनुशासित बनाया। जवारे विसर्जन और कटीला परंपरा ने एक बार फिर साबित कर दिया कि सागर की धार्मिक आस्था केवल रीति-रिवाज नहीं, बल्कि लोकभावनाओं की जीवंत पहचान है।