धाकड़ दे रहे ज्ञान की रोशनी, अंधकार में उजाला, बच्चों के लिए प्रेरणा बने दृष्टिबाधित गुरुजी
कहते हैं कि अगर इरादे मजबूत हों तो कोई भी कमी इंसान को रोक नहीं सकती। एमपी के रायसेन जिले के महेश्वर ग्राम में इसका जीता-जागता उदाहरण हैं एक ऐसे शिक्षक, जो आंखों से देख नहीं सकते, लेकिन अपने ज्ञान और जज़्बे से सैकड़ों बच्चों की ज़िंदगी रोशन कर रहे हैं। रायसेन जिले से लगभग 100 किलोमीटर दूर बसे महेश्वर गांव में श्यामसुंदर धाकड़, जिन्हें लोग श्रद्धा से ‘बिलांड गुरुजी’ कहते हैं, शिक्षा और समर्पण का दूसरा नाम बन चुके हैं।
लाठी के सहारे रोज़ सबसे पहले स्कूल पहुंचना और आखिरी छात्र के जाने के बाद ही घर लौटना उनका रोज़ का नियम है। आंखों से दृष्टिहीन होने के बावजूद उनका आत्मविश्वास और बच्चों के प्रति समर्पण हर किसी के लिए प्रेरणा है। वे न केवल किताबों का ज्ञान देते हैं, बल्कि संस्कार और जीवन मूल्य भी सिखाते हैं। यही वजह है कि गांव का हर बच्चा और अभिभावक उन्हें गुरु से बढ़कर प्रेरणास्रोत मानता है।
महेश्वर ही नहीं, आसपास के इलाके के लोग भी उन्हें समाज की रोशनी मानते हैं। उनकी कहानियां साबित करती हैं कि सच्चा उजाला दृढ़ता और ज्ञान से आता है, न कि आंखों की रोशनी से। बच्चों की मुस्कान और उनकी पढ़ाई को देखकर गुरुजी कहते हैं – “मेरी आंखें नहीं, लेकिन बच्चों की कामयाबी ही मेरी असली दृष्टि है।”