जर्जर स्कूल भवन में जान जोखिम में डालकर पढ़ाई, टपकती छत, गिरता प्लास्टर और इसी में पढ़ते हैं बच्चे
एमपी के उज्जैन ज़िले के खाचरोद की ग्राम पंचायत छोटा चिरौला में स्थित शासकीय हाई स्कूल की हालत किसी खंडहर से कम नहीं है। यहां के बच्चों को हर दिन खतरे के साये में पढ़ाई करनी पड़ रही है। गांव छोटा चिरौला का यह स्कूल सन् 1985 में बना था, यानी करीब 38 साल पहले। लेकिन आज तक इस भवन की मरम्मत नहीं करवाई गई। बरसात में छत से पानी टपकता है, प्लास्टर गिरता है, और बच्चे डर के बीच पढ़ाई करते हैं। छात्रों के लिए यह भवन अब शिक्षा का मंदिर नहीं, बल्कि जान का खतरा बन चुका है।
स्कूल शिक्षक बताते हैं कि वे हर साल उच्च अधिकारियों को पत्र लिखते हैं, हालात बताते हैं, लेकिन अब तक कोई कार्यवाही नहीं हुई। "छत से रोज़ प्लास्टर गिरता है, बारिश में तो हाल और भी खराब हो जाता है। हमने कई बार रिपोर्ट भेजी है, लेकिन कुछ नहीं हुआ।" गांव के लोगों का कहना है कि यदि समय रहते इस स्कूल भवन की मरम्मत नहीं की गई, तो किसी दिन कोई बड़ा हादसा हो सकता है। बच्चों को शिक्षा देने का ये तरीका कहीं से भी सुरक्षित नहीं कहा जा सकता। सरकार की योजनाओं में भले ही स्कूलों के विकास की बात होती है, लेकिन छोटा चिरौला का यह स्कूल हकीकत का आईना है। सवाल यह है कि बच्चों की जान जोखिम में डालकर कब तक पढ़ाई करवाई जाएगी? क्या अब भी कोई सुनवाई होगी?