Sagar - चल माई, चल माई के जयघोषों के साथ निकली कांधे वाली काली, ड्रोन की नजर से देखिए
Sagar - चल माई, चल माई के जयघोषों के साथ निकली कांधे वाली काली, ड्रोन की नजर से देखिए
सागर में नौ दिनों तक जगतजननी की आराधना के बाद विजयादशमी पर भक्तों ने मातारानी को विदाई दी। शहर में करीब 200 से ज्यादा स्थानों पर पंडाल में विराजमान की गई मां की प्रतिमाओं का चल समारोह निकाला गया। भक्तों ने चल माई के जयघोषों के साथ मातारानी को विदाई दी।
लेहदरा नाका स्थित बड़ी नदी और चितौरा में प्रतिमाओं का विसर्जन किया गया। दोपहर से शुरू हुआ देवी प्रतिमाओं के विसर्जन का सिलसिला एकादशी की रात तक चलता रहा। शनिवार रात शहर की सबसे प्रसिद्ध पुरव्याऊ की कांधे वाली काली का चल समारोह निकला। पुरव्याऊ से माता को कंधों पर बैठाकर भक्त विसर्जन के लिए लेकर निकले। इसके बाद हर ओर चल माई-चल माई के जयघोष ही सुनाई दिए। लोगों ने पुष्पवर्षा कर मां का स्वागत किया। चल समारोह में आगे मशाल चल रही थी। सैकड़ों की संख्या में युवा सड़क पर दौड़ लगा रहे थे। वहीं पीछे श्रद्धालुओं के कांधे पर सवार मां दुर्गा जी की प्रतिमा चल रही थी। इस दृश्य को निहारने के लिए चल समारोह मार्ग पर हजारों लोग पहुंचे।
जानकार बताते हैं कि शहर की सबसे प्रसिद्ध पुरव्याऊ की कांधे वाली काली का एक सदी से भी ज्यादा का गरिमामयी इतिहास है। पहली बार वर्ष 1905 में मां की स्थापना हुई थी। तभी से मां महषासुर मर्दनी के वैभव और स्वरूप में कहीं कोई परिवर्तन नहीं आया। पुरव्याऊ की काली माई के तीनबत्ती पहुंचने पर हजारों भक्त हाथ जोड़कर चल माई काली माई के जयकारे लगा रहे थे। ऊपर से फूलों की बारिश हो रही थी। आतिशबाजी से आसमान जगमग हो गया। माता का दिव्य और अलौकिक दृश्य हर कोई अपने कैमरे में कैद करने में लगा रहा। देर रात माता का विसर्जन चकराघाट पर किया गया।
मोहन नगर वार्ड में विराजमान काली जी भैयाजी वैद्य का विजयादशमी पर चल समारोह निकाला गया। भक्तों के कंधों पर पालकी में सवार होकर मातारानी निकली। घर-घर रंगोली बनाकर भक्तों ने स्वागत किया गया। शहर में हजारों स्थानों पर स्वागत किया। माता की झांकी को मोहननगर वार्ड से विसर्जन स्थल चकराघाट तक का 14 किलोमीटर का रूट तय करने में 10 घंटे का समय लगा