हाकगंज बरंडा ढहा,पुलिस ने किया रेस्क्यू,प्राइवेट कंस्ट्रक्शन के चलते चल रही थी खुदाई
हाकगंज बरंडा ढहा,पुलिस ने किया रेस्क्यू,प्राइवेट कंस्ट्रक्शन के चलते चल रही थी खुदाई
सालों पुराना हाकगंज बरंडा ढहा जेबीसी चालक मलबे में दबा
दमोह के घंटाघर के पास प्राचीन धरोहर हाकगंज बरंडा का स्ट्रक्चर एक निजी निर्माण कार्य के चलते अचानक ढह गया। घटना शनिवार रात करीब 11 बजे की है। इसमें जेसीबी चालक मलबे में दब गया। जिसे पुलिस ने मशक्कत के बाद बाहर निकाल कर जिला अस्पताल में भर्ती कराया। जानकारी के मुताबिक हाकगंज बरंडा से सटकर स्थानीय स्वप्निल बजाज अपना निजी निर्माण कार्य करा रहे हैं और इसी को लेकर यहां खुदाई चल रही थी चलाई जा रही थी, तब जेसीबी के वाइब्रेशन से स्ट्रक्चर ढह गया। घटना की सूचना जैसे ही प्रशासन को मिली तत्काल पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी मौके पर पहुंच गए। संभावना जताई जा रही थी की मलबे के नीचे कोई और भी दबा हुआ हो सकता है, इसलिए तत्काल और मलबा हटाया गया, लेकिन वहां पर सब कुछ ठीक निकला।
एसपी श्रुतकीर्ति सोमवंशी ने बताया कि बरंडा के पीछे एक प्राइवेट कंस्ट्रक्शन चल रहा था, इसमें नगर पालिका आगे की कार्रवाई करेगा। इसमें इस बात की जानकारी एकत्रित की जाएगी की स्वप्निल बजाज के द्वारा किया जा रहा निर्माण कार्य नियम अनुसार किया जा रहा था कि नहीं। इसमें यदि कोई लापरवाही होगी तो उनके खिलाफ भी कार्रवाई की जाएगी। मामले में पार्षद कपिल सोनी का कहना है कि यह जो निर्माण कार्य चल रहा था स्वप्निल बजाज और सोनू बजाज द्वारा करवाया जा रहा था। मैंने नगर पालिका में भी इसकी शिकायत की थी, पूछा था कि परमिशन है कि नहीं ह। नगर पालिका ने जानकारी दी कि पिछले हफ्ते तक आवेदन लगा था परमिशन लिखित रूप में प्राप्त नहीं हुई थी। इसके बावजूद जिस तरह से बेसमेंट बनाने के लिए गड्ढा किया जा रहा था, उससे लग रहा था कि इस तरह का हादसा कभी भी हो सकता है। मैंने व्यक्तिगत रूप से नगर पालिका को कहा कि इसे देखा जाए, क्योंकि बरंडा के साइड से ज्यादा खुदाई हो रही है। लेकिन नगर पालिका ने इसे अनदेखा किया और परिणाम स्वरुप यह हादसा हुआ।
शहर के गांधी चौक के पास स्थित हाकगंज बरंडा में ऊंची-ऊंची पत्थरों की तीन इमारतें बनी हैं। इसका निर्माण अंग्रेजी शासन काल में किया गया था। 1861 में मध्य प्रांत का गठन हुआ। उस समय दमोह को जिला बनाया गया। उसी दौरान कमिश्नर हाक ने दमोह में पत्थरों की तीन अलग-अलग इमारतें बनाई थीं जो तीन ओर से आपस में जुड़ी हुई थीं। जिनमें कमिश्नर बैठते थे। कमिश्नर द्वारा इन्हें बनवाने के कारण ही यहां का नाम हाकगंज पड़ा।